यक़ीन नहीं होरहा है कि राहत इन्दौरी साहब को कोरोना ने अपना शिकार बना लिया।अल्लाह के यहां से आते हैं और उसी के यहां लौट जाते हैं।
इंदौरी साहब अपने आप मे एक संस्थान थे।वह शेर जब पढ़ते उनका पूरा शरीर कविता का रूप धारण कर लेता। ज़बान बोलती, आँखे बोलतीं, हाथ के उठते गिरते तेवर बोलते! किसी ने कहा मेरी हिम्मत मेरा ताज है और मै इसे शहंशाह की तरह पहनता हूँ। वह ऐसा शहनशाह जो लोगों के दिलों ही नहीं रूहों पर भी हुकूमत करता था।
राहत इन्दोरी अपने अंदाज़ के अकेले शायर थे जो श्रोताओं के सामने अपने विरुद्ध सच बोलने की हिम्मत करते और ताज के विरुद्ध भी बोलने में नहीं हिचकते।
प्रतिभा के धनी तो थे ही उच्च कोटि के इंसान थे। शायर तो अपने आप एक श्रेणी में आते हैं जिनमें ख़ुद्दारी कूट कर भरी होती है। उनकी ख़ुद्दारी उनके शेरों से टपकती थी।
उनके कुछ शेर देखें:--
रोज़ रातों को नुमाइश में ख़लल पड़ता है
चांद पागल है अंधेरे में निकल पड़ता है ।
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रेंगने की भी इजाज़त नहीं हमको वरना
हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते।
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रचनाकार मरता नहीं है बल्कि मौत मंजर के झड़ने की भांति है जिसमें कि फल बढ़ सके। होरेस ने कहा," I shall not wholly die and a great part of me will escape the grave." अर्थात मैं पूर्णरुपेण नहीं मरूंगा मेरा अधिक भाग क़ब्र से बच निकलेगा।
कहा जाता है कि मौत भी जन्म का समकक्षी है। शास्वत जीवन का आरम्भ हो गया है। मर के अमर हैं। डॉक्टर इक़बाल के शब्दों में:
मौत को समझे हैं ग़ाफ़िल एख़ततामे ज़िंदगी
है ये शामे ज़िन्दगी सुबह ए दवामे ज़िन्दगी।
उनका जाना दर्दनाक है। मगर जाने के बारे में जो शेर लिखा वह उनके चरित्र को परिभाषित करता है:--
हाथ खाली है तेरे शहर से जाते जाते
जान होती तो मेरी जान लुटाते जाते।
अक्सर नदियाँ उनके शेर में होतीं। उनके छोटे पुत्र का भी नाम सतलज है। आज सतलज भी आंसूओं में ग़रक़ाब है।
अब्दुल हफ़ीज़ ख़ान।
बहुत अच्छा लेख रहबर साहब!👌👌
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