दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के बीच दिल्ली दंगों के लिए अधिवक्ताओं की नियुक्ति पर विवाद एक महत्वपूर्ण ख़बर है। मुख्यमंत्री यदि जनमत जो कि सार्वभौम है द्वारा निर्वाचित है तो उपराज्यपाल को उसके कार्यपालिका के कार्य को करने का कोई अधिकार नहीं है।
मुझे पहली ईस्वी में जन्मे रोमन कवि Juvenal और उनकी कविता याद आगई। अंग्रेज़ी साहित्य में 17 वीं -18वीं सदी में Pope और Dryden ने satire लिखे तथा Dryden ने तो Juvenel की Satire नामक कविता का अनुवाद किया। Juvenal लिखता है", It is hard not to write satire
For who is tolerant of the unjust city, so steeled, that he can restrain himself".
अर्थात व्यंग लिखना कठिन नहीं है क्योंकि कौन व्यक्ति इस्पात का बना हुआ होगा जो अन्यायी नगर का सहन कर लेगा और अपने को रोक सकेगा।"
उस राजतन्त्र में भी कवि प्रबल विरोध कर पाया। उसने कहा," Quis custodies isis custodies" अर्थात पहरेदारों की पहरेदारी कौन करेगा?
होमर की किताब Vigilante में उसकी पुत्री Lisa पूछती है,"If you are the police who will police the police" होमर का उत्तर है कि मुझे मालूम नहीं।
दंगों को लोगों ने कैमरों की नज़रों से भी देखा। भाषण देनेवाले नेताओं को भी और रिवॉल्वर ताने दंगाई को भी। एक झुंड जो वर्दीधारी थी और गिरे पिटाते नवजवानों को भी जिसमें कोई मर भी गयाबेरहमी से पीटते वीडियो क्लिप दुनियां ने देखा।
पुलिस और उपराज्यपाल ने 6 अधिवक्ता गण को चुना है--तुषार मेहता,अमन लेखी,चेतन शर्मा,S V Raju, अमित महाजन,रजत नायर।
अमन लेखी तो भाजपा सांसद सदस्य मीनाक्षी लेखी के पति हैं।
इंसाफ होने के लिए कटघरे तक अपराधी को सबूत के साथ लाने की ज़िम्मेदारी पुलिस और अभियोजन को है।
दिल्ली सरकार की कैबिनेट ने इस पैनल को रिजेक्ट कर दिया और कहा," There have been allegations that the investigations of the Delhi police in these cases are biased and not impartial. The judiciary has also made adverse remarks against Delhi Police...."
केजरीवाल ने इस पैनल को रद्द करके एक अच्छा सन्देश दिया है कि जनता की चुनी सरकार केवल नाम मात्र की सरकार नहीं है तथा यह भी कि सरकार को एहसास है कि कहां ग़लती हुई है।
अब्दुल हफ़ीज़ ख़ान।
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